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क्या है नवकार महामंत्र और क्यों माना जाता है इसे अत्यंत पावन

हर वर्ष 9 अप्रैल को नवकार महामंत्र दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर देशभर में जैन धर्म के अनुयायी श्रद्धा और भक्ति से नवकार महामंत्र का जप करते हैं। वर्ष 2025 में भी इस दिन का विशेष महत्व है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई गणमान्य व्यक्तियों ने सामूहिक रूप से नवकार मंत्र का जाप किया और इसके आध्यात्मिक उद्देश्य पर प्रकाश डाला। उन्होंने लोगों को जीवन की नकारात्मकता से दूर रहने और सकारात्मकता अपनाने की प्रेरणा दी।

नवकार महामंत्र क्या है

नवकार महामंत्र जैन धर्म का सबसे पवित्र और प्राचीन मंत्र है। इसे ‘नमस्कार महामंत्र’, ‘मंगल मंत्र’ या ‘परमेष्ठी मंत्र’ भी कहा जाता है। यह मंत्र किसी विशेष व्यक्ति, देवता या शक्ति को समर्पित नहीं है, बल्कि यह उन आत्माओं को नमन करता है जिन्होंने आत्मज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति की है। इस मंत्र का जप ध्यान और समर्पण के साथ किया जाता है।

नवकार महामंत्र के शब्द और उनका अर्थ

नवकार महामंत्र इस प्रकार है:

नमो अरिहंताणं
नमो सिद्धाणं
नमो आयरियाणं
नमो उवज्झायाणं
नमो लोए सव्व साहूणं
एसो पंच णमोक्कारो, सव्व पावप्पणासणो
मंगलाणं च सव्वसिं, पढमं हवइ मंगलं

इसका भावार्थ है:

मैं अरिहंतों को, सिद्धों को, आचार्यों को, उपाध्यायों को और सभी साधु-संतों को नमस्कार करता हूं। ये पांचों नमस्कार सभी पापों का नाश करने वाले हैं और सभी मंगलों में सर्वोपरि हैं।

नवकार महामंत्र का महत्व

इस मंत्र के उच्चारण से मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और आत्मिक विकास की प्राप्ति होती है। ऐसा माना जाता है कि इसका जप सभी पापों का नाश करता है और साधक को मोक्ष की ओर अग्रसर करता है। नवकार महामंत्र आत्मा की शुद्धि और विश्व कल्याण के लिए सर्वोत्तम साधन माना जाता है।

नवकार मंत्र जप के नियम

जैन धर्म के अनुसार नवकार मंत्र का जप विषम या सम संख्या में किया जा सकता है। इसकी गिनती 1 से 25 बार तक हो सकती है। मंत्र जाप से पहले साधक को ध्यान की अवस्था में बैठना चाहिए और मन को पूरी तरह एकाग्र करना चाहिए। तभी इसका पूर्ण लाभ प्राप्त होता है।

नवकार महामंत्र का ऐतिहासिक महत्व

प्राचीन शिलालेखों में नवकार मंत्र का उल्लेख मिलता है। आरंभिक काल के शिलालेखों में ‘नमो अरिहंताणं’ और ‘नमो सिद्धाणं’ जैसे अंश मिले हैं, जबकि बाद में पूर्ण नवकार महामंत्र की रचना हुई। यह मंत्र आज भी जैन धर्म में सामूहिक और व्यक्तिगत साधना का मूल स्तंभ माना जाता है।

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Author: Panditjee

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