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मासिक कालाष्टमी 2025: तिथि, व्रत विधि, महत्व और मान्यताएँ
कालाष्टमी या काला अष्टमी भगवान काल भैरव को समर्पित एक पवित्र हिंदू पर्व है। यह हर हिंदू चंद्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि (पूर्णिमा के बाद आठवां दिन) को मनाया जाता है।
कालाष्टमी का महत्व
पूर्णिमा के बाद आने वाली अष्टमी तिथि को भगवान काल भैरव की पूजा के लिए सबसे उपयुक्त दिन माना जाता है। इस दिन भक्त व्रत रखते हैं और पूरी श्रद्धा से काल भैरव की उपासना करते हैं।
एक वर्ष में कुल 12 कालाष्टमी तिथियाँ आती हैं, जिनमें मार्गशीर्ष माह में पड़ने वाली कालाष्टमी को कालभैरव जयंती कहा जाता है और इसका विशेष महत्व होता है।
यदि कालाष्टमी रविवार या मंगलवार को पड़े तो इसे और भी अधिक पुण्यदायी माना जाता है, क्योंकि ये दिन भी भगवान भैरव को समर्पित माने जाते हैं।
कालाष्टमी 2025 की तिथि और समय
तिथि: सोमवार, 21 अप्रैल 2025
अष्टमी तिथि प्रारंभ: 20 अप्रैल, शाम 7:01 बजे
अष्टमी तिथि समाप्त: 21 अप्रैल, शाम 6:59 बजे
कालाष्टमी पर व्रत एवं पूजन विधि
इस दिन भक्त प्रातःकाल सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करते हैं।
फिर भगवान काल भैरव की विशेष पूजा करते हैं और उनसे पापों से मुक्ति और आशीर्वाद की कामना करते हैं।
मंदिरों में जाकर शाम को पूजा अर्चना करना और दीप जलाना शुभ माना जाता है।
कुछ भक्त पूरे दिन व्रत रखते हैं और केवल जल पर रहते हैं।
कई श्रद्धालु रातभर जागरण करते हैं और महाकालेश्वर की कथाएँ सुनते हैं।
इस दिन पूर्वजों के लिए भी पूजा एवं तर्पण किया जाता है।
कालाष्टमी पर विशेष परंपराएँ
भगवान काल भैरव का वाहन काला कुत्ता माना जाता है। इसलिए इस दिन कुत्तों को दूध, दही और मिठाई खिलाने की परंपरा है।
काशी जैसे तीर्थ स्थलों पर ब्राह्मण भोजन कराने से विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
इस दिन काल भैरव कथा का पाठ और मंत्रों का जाप करना भी बहुत फलदायक माना जाता है।
पौराणिक कथा और मान्यता
कालाष्टमी की महिमा आदित्य पुराण में वर्णित है। भगवान काल भैरव, भगवान शिव का एक उग्र रूप माने जाते हैं।
‘काल’ का अर्थ है समय, और ‘भैरव’ का अर्थ है भगवान शिव का एक रक्षक रूप। इसलिए उन्हें “समय के देवता” भी कहा जाता है।
एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार ब्रह्मा, विष्णु और महेश के बीच विवाद हुआ। ब्रह्मा जी द्वारा कही गई एक बात से भगवान शिव क्रोधित हो गए और उन्होंने महाकालेश्वर रूप धारण कर ब्रह्मा जी का पाँचवाँ सिर काट दिया। तभी से भगवान शिव के इस रूप की काल भैरव के रूप में पूजा होने लगी।
मान्यता है कि जो भी श्रद्धा से कालाष्टमी का व्रत करता है और भगवान काल भैरव की पूजा करता है, उसकी सभी बाधाएँ दूर होती हैं, दुखों का नाश होता है और जीवन में सफलता एवं समृद्धि प्राप्त होती है।