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भगवान कृष्ण ने शिशुपाल को क्यों दी थी 100 अपराधों की छूट जानें इसके पीछे की पूरी कथा

महाभारत की कथा में अनेक पात्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिनमें शिशुपाल का भी एक विशेष स्थान है। शिशुपाल भगवान श्रीकृष्ण की बुआ का पुत्र था और इस नाते दोनों के बीच पारिवारिक संबंध थे। इसके बावजूद शिशुपाल सदैव भगवान कृष्ण का विरोध करता रहा और उन्हें बार-बार अपमानित करता रहा। इस परिस्थिति में भी भगवान कृष्ण ने शिशुपाल के 100 अपराधों को क्षमा किया, जो अपने आप में एक विलक्षण प्रसंग है। आइए जानते हैं कि इसके पीछे क्या कारण था और शिशुपाल का अंत कैसे हुआ।

असामान्य रूप में हुआ था शिशुपाल का जन्म

महाभारत के अनुसार जब शिशुपाल का जन्म हुआ, तब उसका शरीर सामान्य शिशुओं से भिन्न था। उसके चार भुजाएं थीं और तीन नेत्र। यह दृश्य देखकर उसके माता-पिता अत्यंत भयभीत हो गए और त्याग का विचार करने लगे। उसी समय आकाशवाणी हुई कि यह बालक अत्यंत पराक्रमी होगा, और जिसकी गोद में इसके अतिरिक्त अंग विलीन हो जाएंगे, वही इसका काल बनेगा।

राज्य के अनेक राजा और राजकुमार शिशुपाल को अपनी गोद में लेते रहे, पर कोई परिवर्तन नहीं हुआ। अंततः जब बालक को भगवान श्रीकृष्ण की गोद में रखा गया, तो उसके अतिरिक्त भुजाएं और नेत्र अदृश्य हो गए। यह देख शिशुपाल की माता अत्यंत चिंतित हो गईं क्योंकि उन्हें ज्ञात हो गया कि उनका पुत्र श्रीकृष्ण के हाथों ही मारा जाएगा।

भगवान कृष्ण ने निभाया बुआ से किया वादा

शिशुपाल की माता की व्याकुलता को देखकर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे शिशुपाल के 100 अपराधों को क्षमा करेंगे। श्रीकृष्ण को यह भलीभांति ज्ञात था कि शिशुपाल का स्वभाव अहंकारी और उग्र है तथा वह अपने आचरण से निश्चित ही इन अपराधों की सीमा को पार करेगा। यह प्रतिज्ञा केवल एक मातृ-प्रेम का सम्मान नहीं थी, बल्कि एक गहन धर्मसंकल्प भी था।

शिशुपाल के अपराधों की सीमा और उसका अंत

समय बीतने के साथ शिशुपाल का व्यवहार और अधिक उद्दंड होता गया। वह निरंतर भगवान श्रीकृष्ण का अपमान करता रहा और उनका उपहास उड़ाता रहा। श्रीकृष्ण अपनी प्रतिज्ञा का पालन करते हुए शांति और धैर्य के साथ उसके प्रत्येक अपराध को क्षमा करते रहे।

परंतु जब युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के अवसर पर शिशुपाल ने भगवान श्रीकृष्ण के प्रति घोर अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया, उन्हें नीच कुल का कहकर उनका मजाक उड़ाया, तब उसने मर्यादा की सभी सीमाएं पार कर दीं। यह उसका 100वां अपराध था।

धर्म की रक्षा और अपनी प्रतिज्ञा के पालन हेतु श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र का प्रयोग कर शिशुपाल का वध किया। इस प्रकार उन्होंने अपने वचन का सम्मान करते हुए अधर्म का अंत कर दिया।

श्रीकृष्ण द्वारा शिशुपाल को 100 अपराधों की छूट देना केवल पारिवारिक संबंधों की मर्यादा नहीं, बल्कि धैर्य, धर्म और वचनबद्धता का एक आदर्श उदाहरण है। यह प्रसंग दर्शाता है कि भगवान श्रीकृष्ण अपने सिद्धांतों और कर्तव्यों के पालन में कितने सजग और दृढ़ थे।

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Author: Panditjee

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