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प्रदोष व्रत 2025 पर शिव रक्षा स्तोत्र का पाठ कैसे करें और पाएं सभी दुखों से मुक्ति
10 अप्रैल 2025, गुरुवार को चैत्र शुक्ल त्रयोदशी तिथि के शुभ अवसर पर प्रदोष व्रत का आयोजन किया जाएगा। यह व्रत विशेष रूप से भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना के लिए समर्पित होता है। प्रदोष व्रत के दिन श्रद्धालु व्रत रखते हैं और शिव-शक्ति की पूजा करके कृपा प्राप्त करते हैं। इस दिन भगवान शिव की आराधना से साधक के जीवन में सुख, सौभाग्य और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।
प्रदोष व्रत का प्रभाव दिन विशेष पर आधारित होता है। गुरुवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत को गुरु प्रदोष कहा जाता है, जो विशेष फलदायी माना गया है। इस दिन शिवजी की कृपा प्राप्त करने के लिए शिव रक्षा स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है। यह स्तोत्र साधक की सभी बाधाओं को दूर करने की क्षमता रखता है।
शिव रक्षा स्तोत्र
चरितं देवदेवस्य महादेवस्य पावनम्
अपारं परमोदारं चतुर्वर्गस्य साधनम्
गौरीविनायकोपेतं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रकम्
शिवं ध्यात्वा दशभुजं शिवरक्षां पठेन्नरः
गंगाधरः शिरः पातु भालं अर्धेन्दुशेखरः
नयने मदनध्वंसी कर्णौ सर्पविभूषण
घ्राणं पातु पुरारातिः मुखं पातु जगत्पतिः
जिह्वां वागीश्वरः पातु कंधरां शितिकंधरः
श्रीकण्ठः पातु मे कण्ठं स्कन्धौ विश्वधुरन्धरः
भुजौ भूभारसंहर्ता करौ पातु पिनाकधृक्
हृदयं शंकरः पातु जठरं गिरिजापतिः
नाभिं मृत्युञ्जयः पातु कटी व्याघ्राजिनाम्बरः
सक्थिनी पातु दीनार्तशरणागतवत्सलः
उरू महेश्वरः पातु जानुनी जगदीश्वरः
जङ्घे पातु जगत्कर्ता गुल्फौ पातु गणाधिपः
चरणौ करुणासिंधुः सर्वाङ्गानि सदाशिवः
एतां शिवबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्
स भुक्त्वा सकलान्कामान् शिवसायुज्यमाप्नुयात्
ग्रहभूतपिशाचाद्यास्त्रैलोक्ये विचरन्ति ये
दूरादाशु पलायन्ते शिवनामाभिरक्षणात्
अभयङ्करनामेदं कवचं पार्वतीपतेः
भक्त्या बिभर्ति यः कण्ठे तस्य वश्यं जगत्त्रयम्
इमां नारायणः स्वप्ने शिवरक्षां यथाऽदिशत्
प्रातरुत्थाय योगीन्द्रो याज्ञवल्क्यः तथाऽलिखत
शिव आरती
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा
एकानन चतुरानन, पञ्चानन राजे
हंसासन गरूड़ासन, वृषवाहन साजे
दो भुज चार चतुर्भुज, दशभुज अति सोहे
त्रिगुण रूप निरखते, त्रिभुवन जन मोहे
अक्षमाला वनमाला, मुण्डमाला धारी
त्रिपुरारी कंसारी, कर माला धारी
श्वेताम्बर पीताम्बर, बाघम्बर अंगे
सनकादिक गरुणादिक, भूतादिक संगे
कर के मध्य कमण्डलु, चक्र त्रिशूलधारी
सुखकारी दुखहारी, जगपालन कारी
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, जानत अविवेका
प्रणवाक्षर मध्ये, ये तीनों एका
लक्ष्मी व सावित्री, पार्वती संगा
पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा
पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा
भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा
जटा में गंगा बहत है, गल मुण्डन माला
शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला
काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी
त्रिगुणस्वामी जी की आरती, जो कोई नर गावे
कहत शिवानन्द स्वामी, मनवांछित फल पावे
ॐ जय शिव ओंकारा…
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