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चैत्र पूर्णिमा पर विष्णु चालीसा का पाठ लाता है सुख समृद्धि और शांति
हर माह की पूर्णिमा तिथि धार्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत पवित्र मानी जाती है, परंतु चैत्र पूर्णिमा का विशेष महत्व है। इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करने से न केवल आर्थिक समृद्धि प्राप्त होती है, बल्कि जीवन के संकटों से मुक्ति का मार्ग भी प्रशस्त होता है। हिंदू धर्म में यह तिथि पुण्यफलदायक मानी जाती है और शुभ कार्यों के लिए अत्यंत उपयुक्त मानी जाती है।
चैत्र पूर्णिमा पर विष्णु चालीसा का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चैत्र पूर्णिमा के दिन विधिपूर्वक भगवान विष्णु की पूजा करने और विष्णु चालीसा का पाठ करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह चालीसा न केवल मानसिक शांति प्रदान करती है, बल्कि भय और दुखों से भी रक्षा करती है। इस अवसर पर श्रीहरि की आराधना से आत्मिक बल की प्राप्ति होती है, जो कठिन समय में मार्गदर्शन करता है।
दान का महत्व
चैत्र पूर्णिमा के दिन पूजा-अर्चना के बाद वस्त्र, अन्न, जल और धन का दान करने की परंपरा है। यह माना जाता है कि इस दिन किए गए दान से व्यक्ति को विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन में लक्ष्मी कृपा बनी रहती है। कारोबार में उन्नति और पारिवारिक सुख-शांति की प्राप्ति के लिए यह एक श्रेष्ठ दिन माना जाता है।
विष्णु चालीसा का पाठ
विष्णु चालीसा एक भक्ति गीत है जो भगवान विष्णु के विविध स्वरूपों, लीलाओं और गुणों का गुणगान करता है। इसका पाठ भक्तों को आध्यात्मिक शांति और समृद्धि प्रदान करता है। इसे श्रद्धा और विश्वास के साथ पढ़ने से प्रभु की कृपा सहज ही प्राप्त होती है।
।। विष्णु चालीसा का पाठ ।।
”दोहा”
विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय ।
कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय ॥
नमो विष्णु भगवान खरारी, कष्ट नशावन अखिल बिहारी ।
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी, त्रिभुवन फैल रही उजियारी ॥
सुन्दर रूप मनोहर सूरत, सरल स्वभाव मोहनी मूरत ।
तन पर पीताम्बर अति सोहत, बैजन्ती माला मन मोहत ॥
शंख चक्र कर गदा विराजे, देखत दैत्य असुर दल भाजे ।
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे, काम क्रोध मद लोभ न छाजे ॥
सन्तभक्त सज्जन मनरंजन, दनुज असुर दुष्टन दल गंजन ।
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन, दोष मिटाय करत जन सज्जन ॥
पाप काट भव सिन्धु उतारण, कष्ट नाशकर भक्त उबारण ।
करत अनेक रूप प्रभु धारण, केवल आप भक्ति के कारण ॥
धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा, तब तुम रूप राम का धारा ।
भार उतार असुर दल मारा, रावण आदिक को संहारा ॥
आप वाराह रूप बनाया, हिरण्याक्ष को मार गिराया ।
धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया, चौदह रतनन को निकलाया ॥
अमिलख असुरन द्वन्द मचाया, रूप मोहनी आप दिखाया ।
देवन को अमृत पान कराया, असुरन को छवि से बहलाया ॥
कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया, मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया ।
शंकर का तुम फन्द छुड़ाया, भस्मासुर को रूप दिखाया ॥
वेदन को जब असुर डुबाया, कर प्रबन्ध उन्हें ढुढवाया ।
मोहित बनकर खलहि नचाया, उसही कर से भस्म कराया ॥
असुर जलन्धर अति बलदाई, शंकर से उन कीन्ह लड़ाई ।
हार पार शिव सकल बनाई, कीन सती से छल खल जाई ॥
सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी, बतलाई सब विपत कहानी ।
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी, वृन्दा की सब सुरति भुलानी ॥
देखत तीन दनुज शैतानी, वृन्दा आय तुम्हें लपटानी ।
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी, हना असुर उर शिव शैतानी ॥
तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे, हिरणाकुश आदिक खल मारे ।
गणिका और अजामिल तारे, बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे ॥
हरहु सकल संताप हमारे, कृपा करहु हरि सिरजन हारे ।
देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे, दीन बन्धु भक्तन हितकारे ॥
चाहता आपका सेवक दर्शन, करहु दया अपनी मधुसूदन ।
जानूं नहीं योग्य जब पूजन, होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन ॥
शीलदया सन्तोष सुलक्षण, विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण ।
करहुं आपका किस विधि पूजन, कुमति विलोक होत दुख भीषण ॥
करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण, कौन भांति मैं करहु समर्पण ।
सुर मुनि करत सदा सेवकाई, हर्षित रहत परम गति पाई ॥
दीन दुखिन पर सदा सहाई, निज जन जान लेव अपनाई ।
पाप दोष संताप नशाओ, भव बन्धन से मुक्त कराओ ॥
सुत सम्पति दे सुख उपजाओ, निज चरनन का दास बनाओ ।
निगम सदा ये विनय सुनावै, पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै ॥
॥ इति श्री विष्णु चालीसा ॥
चैत्र पूर्णिमा का पर्व आध्यात्मिक उन्नति, सुख-समृद्धि और मानसिक शांति प्राप्त करने का उत्तम अवसर है। इस दिन भगवान विष्णु की चालीसा का पाठ, श्रद्धापूर्वक पूजा और यथासंभव दान करने से जीवन में सकारात्मकता और खुशियों का संचार होता है। यह दिन न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि आत्मिक शुद्धि और साधना की दृष्टि से भी अत्यंत फलदायी है।