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चैत्र नवरात्रि के पांचवें दिन स्कंदमाता की पूजा का महत्व विधि भोग मंत्र और शुभ रंग
चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व पूरे भक्तिभाव के साथ मनाया जा रहा है। इस वर्ष 3 अप्रैल, गुरुवार को चैत्र नवरात्रि का पांचवां दिन है, जिसे देवी स्कंदमाता की आराधना के लिए समर्पित माना जाता है। स्कंदमाता, भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता हैं और इन्हें ममता एवं करुणा की देवी के रूप में पूजा जाता है। देवी स्कंदमाता की चार भुजाएं हैं, जिनमें भगवान स्कंद उनकी गोद में विराजमान हैं और उनके हाथों में कमल सुशोभित हैं। माता की पूजा करने से भक्तों को सुख, समृद्धि और संतान सुख की प्राप्ति होती है।
मां स्कंदमाता की पूजा विधि
प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
घर के मंदिर को गंगाजल से शुद्ध कर देवी स्कंदमाता की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
माता को रोली, कुमकुम, अक्षत, फूल, धूप और दीप अर्पित करें।
माता को केले का भोग अर्पित करें।
देवी स्कंदमाता के मंत्रों का जाप करें।
माता की आरती करें और प्रसाद वितरित करें।
मां स्कंदमाता का भोग
नवरात्रि के पांचवें दिन देवी स्कंदमाता को केले का भोग चढ़ाने का विशेष महत्व है। इसे अर्पित करने से माता की कृपा प्राप्त होती है।
मां स्कंदमाता का शुभ रंग
इस दिन पीला और सफेद रंग शुभ माना जाता है। ये रंग सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक हैं।
मां स्कंदमाता का मंत्र
“सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।।”
मां स्कंदमाता की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, तारकासुर नामक राक्षस ने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया और अमर होने का वरदान माँगा। चूंकि अमरता का वरदान संभव नहीं था, इसलिए उसने यह वरदान माँगा कि केवल भगवान शिव का पुत्र ही उसका वध कर सके।
तारकासुर यह मानकर निश्चिंत हो गया कि भगवान शिव विवाह नहीं करेंगे और वह अमर रहेगा। लेकिन देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ, जिससे भगवान स्कंद (कार्तिकेय) का जन्म हुआ। स्कंदमाता से युद्धकला का प्रशिक्षण लेने के बाद, भगवान कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर देवताओं को उसके अत्याचारों से मुक्त किया।
इस प्रकार, स्कंदमाता की पूजा न केवल सुख-समृद्धि देती है, बल्कि जीवन की कठिनाइयों से उबरने की शक्ति भी प्रदान करती है।