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संकष्टी चतुर्थी 2025: विघ्नहर्ता गणेश की उपासना का पावन पर्व
हिंदू धर्म में गणपति बाप्पा को विघ्नहर्ता, संकटमोचक और बुद्धि प्रदाता माना जाता है। संकष्टी चतुर्थी वह दिन है जब भक्त अपने जीवन की बाधाओं से मुक्ति पाने के लिए श्रद्धा और भक्ति से भगवान गणेश का पूजन करते हैं। यह पर्व हर माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को आता है और पूरे वर्ष में 12 से 13 बार मनाया जाता है।
जब यह व्रत मंगलवार को आता है तो इसे अंगारकी संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है, जो विशेष रूप से फलदायी मानी जाती है।
संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक महत्व
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‘संकष्टी’ का अर्थ है संकटों का हरण करने वाली।
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यह दिन भगवान गणेश को समर्पित होता है जो प्रारंभ के देवता हैं।
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यह व्रत जीवन में आ रही रुकावटों, रोगों, ऋण, शत्रुओं और मानसिक अस्थिरता को दूर करने के लिए किया जाता है।
पूजन विधि (Puja Vidhi)
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व्रत प्रारंभ: सूर्योदय से ही व्रत का संकल्प लें और जल या फलाहार पर रहें।
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शाम के समय: जब चंद्रमा उदित हो जाए, तब पूजा शुरू करें।
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गणेश पूजन: गणेश प्रतिमा को स्नान कराकर दूर्वा, सिंदूर, मोदक, नारियल और लाल फूल अर्पित करें।
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स्तोत्र पाठ: ‘गणपति अथर्वशीर्ष’ और ‘संकटनाशन गणेश स्तोत्र’ का पाठ करें।
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चंद्रमा को अर्घ्य: चंद्र दर्शन के बाद उन्हें जल, दूध और अक्षत अर्पित करें और व्रत पूर्ण करें।
क्या मिलता है इस व्रत से?
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जीवन की सभी बाधाएँ दूर होती हैं।
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व्यापार, करियर और शिक्षा में सफलता मिलती है।
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बुद्धि, विवेक और निर्णय क्षमता में वृद्धि होती है।
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पारिवारिक समस्याओं और रोगों से मुक्ति मिलती है।
पौराणिक संदर्भ
एक कथा के अनुसार, जब चंद्रमा ने भगवान गणेश की सूँड का मजाक उड़ाया था, तब गणेश जी ने उसे शाप दिया था कि जो कोई चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन करेगा, उस पर झूठा आरोप लगेगा। इसीलिए संकष्टी चतुर्थी पर चंद्र दर्शन का विशेष नियम है—पूजा के समय ही दर्शन करना शुभ होता है।
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