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एकदंत संकष्टी चतुर्थी 2026: जानिए कैसे भगवान गणेश का यह रूप दूर करता है सभी बाधाएं

एकदंत संकष्टी चतुर्थी हिंदू धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत और पर्व है, जो भगवान गणेश के एकदंत रूप को समर्पित है। यह दिन विशेष रूप से उन भक्तों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है जो जीवन में आने वाली बाधाओं, समस्याओं और संकटों से मुक्ति पाना चाहते हैं। वर्ष 2026 में एकदंत संकष्टी चतुर्थी मई माह में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाएगी।

हिंदू पंचांग के अनुसार, चतुर्थी तिथि 5 मई 2026 को सुबह 5:24 बजे से प्रारंभ होकर 6 मई 2026 को सुबह 7:51 बजे तक रहेगी। इस दिन चंद्र दर्शन का विशेष महत्व होता है, और चंद्रमा का उदय रात 10:35 बजे होगा। संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्रमा के दर्शन के बाद ही खोला जाता है।

एकदंत संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक महत्व भगवान गणेश के एकदंत स्वरूप से जुड़ा हुआ है। ‘एकदंत’ का अर्थ होता है एक दांत वाला। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान गणेश का एक दांत तब टूटा जब उन्होंने भगवान परशुराम को भगवान शिव से मिलने से रोका। क्रोधित होकर परशुराम ने अपने फरसे से गणेश जी पर प्रहार किया, जिससे उनका एक दांत टूट गया। इसके बाद वे ‘एकदंत’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।

एक अन्य कथा के अनुसार, मुद्गल पुराण में वर्णित है कि भगवान गणेश ने एकदंत रूप में अवतार लेकर मादासुर नामक राक्षस का संहार किया था। इस राक्षस के अत्याचारों से देवता परेशान थे। भगवान एकदंत के प्रकट होने पर मादासुर भयभीत हो गया और अंततः पराजित होकर पाताल लोक चला गया। इस प्रकार भगवान गणेश ने देवताओं को संकट से मुक्त किया।

इस दिन भगवान गणेश की पूजा करने से सभी प्रकार के संकट दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। संकष्टी चतुर्थी का व्रत विशेष रूप से कठिनाइयों को दूर करने और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए रखा जाता है।

व्रत रखने वाले भक्त सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और भगवान गणेश का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लेते हैं। दिनभर उपवास रखा जाता है और शाम को भगवान गणेश की विधिपूर्वक पूजा की जाती है। पूजा में दूर्वा घास, मोदक, फल, फूल और दीप अर्पित किए जाते हैं।

इस दिन “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है। कई भक्त गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ भी करते हैं, जिससे विशेष फल प्राप्त होता है।

संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्र दर्शन के बाद ही खोला जाता है। चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद भगवान गणेश की आरती की जाती है और प्रसाद ग्रहण करके व्रत पूर्ण किया जाता है।

यह पर्व हमें यह सिखाता है कि जीवन में आने वाली कठिनाइयों का सामना धैर्य और श्रद्धा के साथ करना चाहिए। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता कहा जाता है, जो अपने भक्तों के सभी कष्ट दूर करते हैं और उन्हें सफलता की ओर अग्रसर करते हैं।

अंततः, एकदंत संकष्टी चतुर्थी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि विश्वास, भक्ति और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। इस दिन सच्चे मन से भगवान गणेश की पूजा करने से जीवन में शांति, सफलता और समृद्धि आती है।

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Author: Panditjee

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