अध्याय 3: कर्म जीवन का हिस्सा है
अध्याय 3 में कृष्ण बताते हैं कि कर्म से भागा नहीं जा सकता। अर्जुन सोचता है कि युद्ध से हट जाने पर उलझन कम हो जाएगी। कृष्ण बताते हैं कि जीवन में हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में कर्म कर ही रहा होता है। चुप बैठना भी एक कर्म बन जाता है।
कृष्ण समझाते हैं कि समाज सहयोग से चलता है। हर व्यक्ति का योगदान जरूरी है। अर्जुन का योद्धा धर्म समाज की रक्षा से जुड़ा है। इसलिए कृष्ण उससे कहते हैं कि वह समझदारी से, बिना डर के, अपने कर्तव्य का पालन करे।
युवा भी जिम्मेदारियों से बचने का मन बनाते हैं। कठिन असाइनमेंट को टालकर मन को हल्का करने की कोशिश करते हैं। करियर चुनने में देर करते हैं क्योंकि निर्णय भारी लगता है। लेकिन कृष्ण बताते हैं कि जिम्मेदारी से भागना मन को हल्का नहीं करता।
कर्म को परिणाम के डर से मुक्त होकर करना मन को आसान बनाता है। पढ़ाई हो या काम, मन साफ रहता है।
अध्याय 3 सिखाता है कि जिम्मेदारी स्वीकारने से स्पष्टता आती है।
