Bhagvad Gita

अध्याय 2: कृष्ण स्थिर कर्म पर इतना क्यों ज़ोर देते हैं

अध्याय 2 में कृष्ण अर्जुन को व्यावहारिक जीवन की दिशा देते हैं। वे बताते हैं कि स्थिर मन से ही स्थिर कर्म निकलता है। जब मन अशांत होता है, फैसले असंगत हो जाते हैं और काम की दिशा खो जाती है।

कृष्ण ऐसे व्यक्ति का चित्र बनाते हैं जो परिस्थितियों के बदलने पर भी संतुलित रहता है। इसका मतलब भावनाएँ खत्म करना नहीं है। इसका अर्थ है भावनाओं को देखें, लेकिन उनसे खिंचकर बह न जाएँ।

युवा अक्सर अचानक प्रतिक्रियाओं में फँस जाते हैं। किसी की सोशल मीडिया टिप्पणी पूरी ऊर्जा बदल देती है। छोटी सी असफलता किसी अच्छी चीज को छोड़ देने का मन बना देती है। कृष्ण का मार्ग यह जगह देता है कि प्रतिक्रिया से पहले सोच सकें।

कृष्ण मन को एक आकर्षण से दूसरे आकर्षण में भागते रहने की आदत के खतरे भी बताते हैं। एकाग्रता कम हो जाती है। यही कारण है कि एक समय में एक काम पर ध्यान देना शक्ति बढ़ाता है।

अध्याय 2 सिखाता है कि संतुलन से कर्म साफ और सार्थक बनता है।

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Author: Panditjee

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