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सनातन धर्म में मूर्ति-पूजा का सत्य 

लेखक: Panditjee.com

 

❌ यह कहना गलत है कि सनातन धर्म में मूर्ति-पूजा होती है
सनातन धर्म, जिसे आमतौर पर हिंदू धर्म कहा जाता है, उसके बारे में सबसे ज़्यादा फैलाया गया झूठ यह है कि हिंदू पत्थर या मूर्ति को ही भगवान मानकर पूजते हैं। दुख की बात यह है कि आज कई हिंदू भी इसी भ्रम में जी रहे हैं।
सच यह है कि सनातन धर्म में मूर्ति-पूजा नहीं, बल्कि मूर्ति-उपासना होती है। यानी भगवान की मूर्ति के माध्यम से उपासना।
“मूर्ति” का अर्थ है — रूप या आकार “उपासना” का अर्थ है — पास बैठना, ध्यान करना, जुड़ना
👉 यानी मूर्ति-उपासना का मतलब है — साकार रूप के माध्यम से निराकार ईश्वर से जुड़ना।

🌸 मूर्ति-उपासना का उद्देश्य क्या है?

सनातन धर्म मानता है कि परम सत्य — ब्रह्म — निराकार, अनंत और इंद्रियों से परे है। लेकिन मानव मन सीमित है। हर कोई तुरंत निराकार पर ध्यान नहीं कर सकता।
इसलिए मूर्ति एक साधन है, लक्ष्य नहीं।
मूर्ति क्या है?

✔ मूर्ति कोई साधारण पत्थर या मिट्टी नहीं होती
✔ प्राण-प्रतिष्ठा के बाद उसे ईश्वर की सजीव उपस्थिति का माध्यम माना जाता है
✔ पत्थर की मूर्ति में देवत्व का लगातार वास माना जाता है इसलिए पूजा होती रहती है
✔ मिट्टी की मूर्ति का पूजा के बाद विसर्जन से यह स्पष्ट किया जाता है कि भगवान मूर्ति में बंधे नहीं हैं

🧠 एक आसान उदाहरण:

जैसे हम फोन के through किसी इंसान से बात करते हैं, फोन को इंसान नहीं मानते — वैसे ही हम मूर्ति के through भगवान से जुड़ते हैं, मूर्ति को भगवान नहीं मानते।
साधक पत्थर की पूजा नहीं करता, बल्कि पत्थर के माध्यम से परमात्मा पर ध्यान करता है।

❓ आम आपत्तियाँ और उनका सरल उत्तर

आपत्ति 1: “हिंदू पत्थर को भगवान मानते हैं”

यह बात वेदांत में साफ-साफ नकारी गई है:
“जिसे आँख नहीं देख सकती, लेकिन जिससे आँख देख पाती है — वही ब्रह्म है।” — केन उपनिषद 1.6
अगर ब्रह्म आँखों से नहीं दिखता, तो जो पत्थर दिख रहा है, वह ब्रह्म कैसे हो सकता है?
👉 खुद हिंदू पूजा-पद्धति बताती है:
• प्राण-प्रतिष्ठा से पहले मूर्ति = सामान्य पत्थर
• विसर्जन के समय देवता को विदा किया जाता है
जिस धर्म में ईश्वर को आह्वान और विसर्जन किया जाता है, वह मूर्ति को ईश्वर नहीं मान सकता।

आपत्ति 2: “भगवान निराकार है, तो मूर्ति क्यों?”

✔ हाँ, भगवान निराकार है:
“उसके हाथ-पैर नहीं, फिर भी वह चलता है” — श्वेताश्वतर उपनिषद 3.19
✔ लेकिन गीता यह भी कहती है:
“निराकार पर ध्यान देहधारी के लिए कठिन है” — भगवद्गीता 12.5
📌 निराकार तक पहुँचने के लिए साकार का सहारा लेना विरोधाभास नहीं है। जैसे — मौन को शब्दों से समझाना।

आपत्ति 3: “यह मूर्ति-पूजा बाइबिल के खिलाफ है”

ईसाई धर्म में भी पूजा और आदर में फर्क माना गया है।
Second Council of Nicaea में साफ कहा गया:
• पूजा केवल ईश्वर की
• प्रतिमा का आदर हो सकता है
संत जॉन ऑफ डैमस्कस कहते हैं:
“प्रतिमा को दिया गया सम्मान मूल सत्य तक पहुँचता है”
अगर ईसाई आइकॉन मूर्ति-पूजा नहीं हैं, तो हिंदू मूर्तियाँ भी नहीं हैं।

आपत्ति 4: “इस्लाम में मूर्ति नहीं, तो हिंदू गलत”

इस्लाम मूर्ति से नहीं जुड़ता — यह पद्धति का फर्क है, सत्य का नहीं।
इस्लाम में भी भौतिक प्रतीक हैं:
• क़िबला (काबा की दिशा)
• काबा का पवित्र पत्थर
• अल्लाह के नामों की सुलेख कला
क़ुरान कहता है:
“उसके जैसा कुछ भी नहीं है”
👉 सनातन धर्म भी यही कहता है। फर्क सिर्फ रास्ते का है।

आपत्ति 5: “अगर भगवान हर जगह है, तो एक मूर्ति क्यों?”

अगर भगवान हर जगह है —
• तो एक दिशा में मुख करना गलत क्यों?
• तो एक प्रतीक पर ध्यान गलत क्यों?
हर धर्म किसी न किसी फोकस पॉइंट का उपयोग करता है।

आपत्ति 6: “इतने रूप मतलब इतने भगवान”

ऋग्वेद स्पष्ट कहता है:
“सत्य एक है, ज्ञानी उसे अनेक नामों से पुकारते हैं” — ऋग्वेद 1.164.46
जैसे:
• पानी, बर्फ, भाप — एक ही तत्व
• पिता, पुत्र, पवित्र आत्मा — तीन भगवान नहीं
वैसे ही अनेक रूप ≠ अनेक सत्य

आपत्ति 7: “मूर्ति-उपासना अंधविश्वास है”

अगर ऐसा है, तो फिर ये भी अंधविश्वास होंगे:
• राष्ट्रध्वज
• राष्ट्रीय गीत
• गणितीय चिन्ह
• न्यायालय की मुहर
मनुष्य प्रतीकों से सोचता है। सनातन धर्म इस सच्चाई को दर्शन बनाता है, अंधविश्वास नहीं।
👉 आदिम धर्म वस्तु में शक्ति मानता है 👉 सनातन धर्म चेतना में शक्ति मानता है
यही फर्क है।

🕉️ शांति मंत्र
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः । सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु । मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
भावार्थ: सब सुखी हों, सब निरोग हों, सब मंगल देखें, कोई भी दुखी न हो।
🕊️ ॐ शांति

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