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संक्रांति फल 2026: वैदिक ज्योतिष में सूर्य संक्रमण का आध्यात्मिक महत्व
संक्रांति क्या है?
संक्रांति वह खगोलीय घटना है जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है। चूँकि सूर्य वर्ष में बारह राशियों से होकर गुजरता है, इसलिए एक सौर वर्ष में कुल 12 संक्रांतियाँ होती हैं।
संक्रांति को वैदिक ज्योतिष में अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है क्योंकि यह समय ऊर्जा परिवर्तन, प्रकृति संतुलन और आध्यात्मिक प्रभावों से जुड़ा होता है।
वैदिक ज्योतिष में संक्रांति का स्वरूप
* वैदिक ग्रंथों के अनुसार संक्रांति को एक प्रतीकात्मक पुरुष रूप में दर्शाया गया है:
* एक मुख
* लंबी नाक और चौड़े होंठ
* नौ भुजाएँ
* आगे की ओर चलता हुआ लेकिन पीछे देखता हुआ
* हाथ में नारियल का खोल
* विस्तार लगभग 60 योजन (लगभग 432 किमी)
* यह रूप परिवर्तनशील समय और कर्मों के प्रभाव को दर्शाता है।
संक्रांति काल का धार्मिक महत्व
हिंदू मान्यताओं के अनुसार संक्रांति काल शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना जाता है, जैसे:
* विवाह
* गृह प्रवेश
* मुंडन
* नए कार्यों की शुरुआत
लेकिन यह समय अत्यंत शुभ होता है:
* दान-पुण्य
* जप-तप
* पितृ तर्पण
* पवित्र नदियों में स्नान
इस दौरान किया गया दान कई गुना फल प्रदान करता है।
संक्रांति फल (Sankranti Phalam)
वैदिक पंचांग के अनुसार हर संक्रांति आने वाले समय के संकेत देती है।
उदाहरण के लिए:
* यदि संक्रांति का संबंध स्वर्ण (सोना) से हो → व्यापार में उतार-चढ़ाव
* यदि अन्न या जल तत्व प्रभावी हो → कृषि व वर्षा प्रभावित
* ग्रह स्थिति समाज, राजनीति और अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करती है
* इसी कारण संक्रांति को भविष्य सूचक काल भी माना जाता है।
संक्रांति केवल एक खगोलीय घटना नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जागरूकता और आत्मशुद्धि का अवसर है।
यह हमें सिखाती है कि जीवन में परिवर्तन स्वाभाविक है और सही कर्मों से ही सकारात्मक फल प्राप्त होते हैं।
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