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27 मई 2026 अधिक शुक्ल द्वादशी: भगवान विष्णु की आराधना से मिलेगा सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति

अधिक शुक्ल द्वादशी हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी तिथि मानी जाती है, जो भगवान विष्णु को समर्पित होती है। वर्ष 2026 में यह पावन तिथि 27 मई (बुधवार) को मनाई जाएगी। इसे विशेष रूप से अधिक मास में आने के कारण और भी अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन को रामलक्ष्मण द्वादशी के रूप में भी जाना जाता है, जो भगवान श्रीराम और लक्ष्मण जी की स्मृति से जुड़ा हुआ है।
हिंदू पंचांग के अनुसार, द्वादशी तिथि 27 मई 2026 को सुबह 6:21 बजे से शुरू होकर 28 मई 2026 को सुबह 7:56 बजे तक रहेगी। व्रत का पारण 28 मई को सुबह 5:25 बजे से 7:56 बजे के बीच करना शुभ माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, द्वादशी तिथि के भीतर पारण करना आवश्यक होता है, तभी व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
अधिक मास, जिसे पुरुषोत्तम मास, मल मास या लोंडा मास भी कहा जाता है, लगभग हर तीन वर्ष में एक बार आता है। यह महीना भगवान विष्णु को समर्पित होता है और इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस महीने में किए गए जप, तप, दान और व्रत का फल कई गुना अधिक होता है।
“पुरुषोत्तम” भगवान विष्णु का ही एक नाम है, इसलिए इस मास को पुरुषोत्तम मास कहा जाता है। इस महीने में द्वादशी का व्रत करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है और यह साधक को आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करता है।
अधिक मास में सामान्यतः विवाह, गृह प्रवेश और अन्य शुभ कार्यों को टाल दिया जाता है, लेकिन यह समय आध्यात्मिक साधना के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना जाता है। इस दौरान भगवान विष्णु की पूजा, मंत्र जाप, दान-पुण्य और ध्यान करने से व्यक्ति को अपार पुण्य प्राप्त होता है।
अधिक शुक्ल द्वादशी का व्रत विशेष रूप से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए किया जाता है। इस दिन भक्तजन सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लेते हैं और भगवान विष्णु की पूजा करते हैं।
पूजा में तुलसी पत्र, पीले फूल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप अत्यंत शुभ माना जाता है। यह मंत्र व्यक्ति के मन को शुद्ध करता है और उसे भगवान के करीब ले जाता है।
भक्त इस दिन उपवास रखते हैं और पूरे दिन भक्ति, जप और ध्यान में समय बिताते हैं। कुछ लोग निर्जल व्रत रखते हैं, जबकि कुछ फलाहार करते हैं। व्रत के दौरान सात्विकता और संयम का पालन करना अत्यंत आवश्यक होता है।
इस व्रत का एक महत्वपूर्ण पक्ष दान-पुण्य भी है। जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र और धन का दान करने से व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है। ब्राह्मणों को भोजन कराना भी अत्यंत शुभ माना जाता है।
अधिक शुक्ल द्वादशी हमें यह सिखाती है कि जीवन में भक्ति, अनुशासन और सेवा का कितना महत्व है। यह दिन हमें अपने भीतर झांकने और आत्मशुद्धि का अवसर देता है।
आज के समय में, जब लोग भौतिक जीवन में व्यस्त हैं, यह व्रत हमें आध्यात्मिक संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देता है। यह व्यक्ति को मानसिक शांति, स्थिरता और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।
अंततः, अधिक शुक्ल द्वादशी केवल एक धार्मिक व्रत नहीं है, बल्कि यह आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष का मार्ग है। भगवान विष्णु की कृपा से व्यक्ति को जीवन में सुख, समृद्धि और सफलता प्राप्त होती है।
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